गुरुवार, 21 जून 2012

वह चेहरा


जिन्दग़ी के हर मोड़ पर
ठहर कर खोजता हूं
वह चेहरा 
छोड़ आया जिसे
बहुत पहले
बहुत पीछे
बहुत दूर

खोजने की जिद्द में उसे
खोता हूं खुद को ही हर दफ़े
निकल जाता बहुत दूर अपने से...


हर दफ़े खोता हूं
भीड़ में
उस-जैसे अनेक-अनेक चेहरों की...

हर दफ़े
अनपाया-अनचीन्हा रह जाता 

खोया हुआ भीड़ में
वह चेहरा
अपना ही .

1 टिप्पणी:

Mritunjay Mishra ने कहा…

nishchay hi yah kavitayen apne samay ka sachcha dastawej hain. qbahaut achcha RAJIV..