साहित्य-संवाद
साहित्य समय और संस्कृति
शनिवार, 13 जून 2026
विवेकी राय : गँवई मनोभाव के ‘सुराजी’ निबंधकार
बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध कवियों, निबंधकारों, कथाकारों और आलोचकों की उपस्थिति-सक्रियता तथा साहित्य-विधाओं की बहुरूपता की दृष्टि से यह अत्यंत समृद्ध काल रहा है। शती के पूर्वार्द्ध में विकसित साहित्य रूपों का क्षितिज- विस्तार और समृद्धि भी इस दौर में खूब हुई । इन्हीं में से दो महत्त्वपूर्ण गद्य-रूप हैं— आंचलिक उपन्यास और ललित निबंध। फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के आँचलिक कथा-रूपों का प्रस्थान और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों का प्रस्थान लगभग एक साथ हुआ। यह वह दौर था जब लेखक की चिंता का केंद्र ‘नए भारत का निर्माण’ था। वह स्वयं को उसके निर्माण का भागीदार मान उसमें यथा शक्य अपनी रचनात्मक भूमिका भी निभा रहा था । रेणु जिस लोक-संस्कृति और आचार्य द्विवेदी जिस लोक और संस्कृति की टेक लेकर चले थे, भारत के भविष्य की वह दिशा स्वतंत्रता के बाद बाधित हुई। इस संबंध में निर्मल वर्मा ने लिखा है, “पैंतीस वर्ष पहले हम कोई दूसरा विकल्प चुन सकते थे, जिसमें मानव सुख की कसौटी भौतिक लिप्सा न होकर जीवन की ज़रूरतों द्वारा निर्धारित होती। पश्चिम जिस विकल्प को खो चुका था भारत में उसकी संभावनाएँ खुली थीं, क्योंकि अपनी समस्त कोशिशों के बावजूद अँग्रेज़ी राज हिंदुस्तान को संपूर्ण रूप से अपनी 'सांस्कृतिक कॉलोनी' बनाने में असफल रहा था।… स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह नहीं है कि शासक वर्ग ने औद्योगीकरण का मार्ग चुना, ट्रेजेडी यह रही है कि पश्चिम की देखादेखी और नक़ल में योजनाएँ बनाते—प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाज़ुक संतुलन किस तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है—इस ओर हमारे पश्चिम-शिक्षित सत्ताधारियों का ध्यान कभी नहीं गया। हम बिना पश्चिम को मॉडल बनाए, अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर, औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धारित कर सकते हैं, कभी इसका ख़याल भी हमारे शासकों को आया हो, ऐसा नहीं जान पड़ता।” विवेकी राय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और फणीश्वरनाथ रेणु दोनों के उत्तराधिकरी हैं। दोनों लेखकों को जिन समस्याओं का पूर्वाभास हो रहा था और जिनके समाधान का स्वप्न उनके साहित्य का लक्ष्य था, राय साहब के समय तक वे समस्याएँ अपने मूर्त और मुखर रूप में सामने आ चुकी थीं। देश की अजादी के बाद विकास के नए मॉडल ने देश में नए तरह की सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक चुनौतियाँ पैदा कीं। उस दौर में नगरीय जीवन, मध्यवर्गीय समाज और नागर सभ्यता की चुनौतियों को साहित्य में खूब उकेरा भी गया। साहित्य के अलग-अलग वादों और विवादों के लिए यह अधिक उपयुक्त भी था। पर ग्रामीण जीवन, उसकी जटिलतओं और नवागत विकास की समस्याओं से जूझती गाँव की काया तथा मन की समझ को गहराई तक महसूस करना और उसे व्यक्त करना उतना सम्भव नहीं हो सका। विवेकी राय ने अपने साहित्य की शुरुआत इसी छोर से की और आजीवन इसी पर डटे रहे। उन्होंने अपने आत्मकथ्य में लिखा है कि “ मेरे लेखन की पृष्ठभूमि ग्राम-जीवन है। वास्तव में वही मेरा जीवन भी है। लगभग आधी उमर धुर देहत के एक गाँव मे गुजारने के बाद एक अत्यन्त पिछडे और छोटे शहर में आया भी तो शहरी नहीं बन पाया...एक पैर गाजीपुर में रहता है तो एक पैर गाँव सोनवानी में रहता है। भारत सरकार की कृपा से गाँव वाले पैर को आराम बहुत है क्योंकि गाज़ीपुर से गाँव पर जाने के लिए छोटी लाइन के पांचवे स्टेशन ताज़पुर-डेहमा पर उतरने के बाद जाडे-गरमी के दिनों में डेढ घंटा पदयात्रा करना अनिवार्य होता है। बाढ-बरसात के दिनो में यह समय दुगुना से ले कर चौगुना तक हो जाता है। सडक एक दुःस्वप्न है। भारत के लाखों गावों की भांति अभी मेरा गाँव भी बिजली और सडक से वंचित है।” यही कारण है कि उनके यहाँ ग्रामीण जीवन के प्रति गहरी संसक्ति है। उन्होंने अपने समूचे लेखन में गाँव को बेहद संजीदगी से जिया है। प्रेमचन्द के ’लमही’ और विवेकी राय के ‘सोनवानी’ में फ़र्क है। लमही आज बनारस से बहुत नज़दीक है। वहाँ शहर से गाँव का लगभग सीधा संवाद है। गाँव और शहर के बीच इस संवाद की झलक प्रेमचन्द के लेखन में भी बार-बार दिखाई देती है। विवेकी राय के यहाँ ये दोनों दो अलग-अलग सिरों पर खडे हैं। विवेकी राय का भारत ग्रामीण भारत है और उनकी भारतीयता का वास ग्राम्य जीवन के भीतर है। गाँव भारतीय समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था तीनों की रीढ़ है। भारतीय समाज व्यवस्था की ताकत और कमजोरी दोनों के बीज इसी के भीतर मौजूद हैं। ऊँच-नीच का जैसा घटाटोप इस व्यवस्था के भीतर है, वैसा नगर जीवन-क्रम में नहीं है। सामूहिकता और साहचर्य का जो रूप हमें ग्राम्य जीवन में दिखाई देता है, वह भी अन्यत्र दुर्लभ है। विवेकी राय के निबंधों में इन दोनों ही रूपों के दर्शन होते होते हैं। ‘फिर बैतलवा डाल पर’ संग्रह के ‘सोने की लूट’ निबंध में किसान (गिरहत्त) और कामगार (प्रजा) के पारंपरिक संबंधों के साथ-साथ ग्रामीण जाति-व्यवस्था संबंधी उनके विचारों का परिचय भी मिलता है— “दरवाजे पर आया तो हलवाहा हल-बैल के साथ तैयार मिला। बोला ‘आज विजयादशमी है न।’ उसका तात्पर्य यह स्पष्ट था। उसे पैसा चाहिए। मिठाई आज वह भी खायेगा। धन्य हैं, वह राम जिनके प्रताप से एक दिन के लिए ही इन्हें भी मिठाई खाने को मिल जाती है। दुनिया के सर्व प्रकार के सुस्वाद भोज्य पदार्थों से पूर्णतया वंचित संसार के सबसे महत्वपूर्ण जीव! मार्क्स-युग के पूज्य-पुरोहित और गाँधी-युग के हरिजन।” विवेकी राय के लेखन से अपरिचित होने पर इस उद्धरण के अंतिम पंक्तियाँ उनकी सामंती मानसिकता अथवा गांधीवाद और मार्क्सवाद के विरोध की अभिव्यक्ति लग सकती हैं, लेकिन लेखक यहाँ भारतीय समाज की विडंबना और भारतीय राजनीति के कड़वे यथार्थ दोनों को एक साथ व्यक्त करना चाहता है। समाज का वह अंत्यज वर्ग, जो सदियों से अस्पृश्यता का दंश झेलता रहा है, वह केवल महिमा-मंडन और राजनीतिक नारों से ऊपर नहीं उठ सकता । उसे ऊपर उठाने के लिए आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता की जरूरत है । गाँधीवाद और मार्क्सवाद समेत भारतीय राजनीति के तमाम आंदोलन इसे आगे बढ़ा पाने में बहुत हद तक असफल रहे हैं । वे प्रायः उनकी स्थिति का राजनीतिक इस्तेमाल करते रहे । विवेकी राय ये पंक्तियाँ ठीक उसी समय लिख रहे थे, जब धूमिल अपनी लम्बी कविता ‘पटकथा’ और ‘मोची राम’ लिख रहे थे । भारतीय राजनीति पर उनकी टिप्पणियों की तुलना में विवेकी राय की ये टिप्पणियाँ अधिक सभ्य और शालीन हैं । विवेकी राय गँवई लेखक हैं। वे बड़े-बड़े नारों, स्लोगनों या ग्राम्य जीवन से अपरिचित उपमानों का प्रयोग प्रायः नहीं करते और ग्रामीण कामगार वर्ग की बदहाली का चित्र खींचते हुए उस वर्ग के सुपरिचित मिथकों का प्रयोग करते हैं, “यहाँ तो भूख का रावण, गरीबी का मेघनाद और मूर्खता का कुंभकरण पूरे ज़ोर पर है। राम-राज्य दूर है। श्रमिक देवता खून दे-देकर एक क्षीण-प्राण हो रहे हैं। पूरी दुनिया लंका हो गई है। एक ओर सोने का संसार है, दूसरी ओर दानवी चक्र में पीसी गरीब प्रजा के आँसुओं का समुद्र है। कहाँ है मानवता? कहाँ है धर्म ? कहाँ है मानवीय गुण?” विवेकी राय न तो नास्तिक हैं और न धर्म-विरोधी ही, परंतु भाग्यवाद और धर्म के नाम पर प्रचलित रूढियों पर प्रहार करने से वे नहीं चूकते। ‘चौबे जी का चमत्कार’ निबंध में लोक-सामान्य के अंधविश्वास पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने लिखा है “जब बूँद आसमान से छूट गई तो मुखिया की नाक और क्या शेष लोगों का शरीर ? सब पर इनकी सूचना अंकित हो गयी और एक अव्यक्त आशंका की सिहरन एक छोर से दूसरे छोर तक जन-समाज को आलोड़ित कर गयी। सोमारू की काकी ने कालीमाई को परसाद चढ़ाने की मनौती की। भरोसे ने अपनी देवी को गोहराया सभापति जी ने हनुमान चालीसा ‘श्री गुरु चरण सरोज रज...’ से शुरू किया। फेंकनी की माई ने हाथ चमकाकर कहा ‘अब ला दैबो के ना देखी गईल।..... तिवारी ने सलाह दी गदहे कि कान में तेल डाल दो, पानी बंद हो जाएगा। हीरा तमोली ने समर्थन किया। उसकी बिक्री अब एकदम खत्म हो चुकी थी। अब गदहा कौन पकड़ लाए ? परोपकार कौन करे ?” दुनिया के शोषण का संबंध धर्म और आस्तिकता से नहीं है, बल्कि सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे वर्चस्वशाली लोगों से है । सारी रूढियाँ और सारा अँधविश्वास इन्हीं के फैलाए हुए हैं । हर समय का प्रभुत्त्वशाली वर्ग अपने-अपने हित के अनुरूप नई-नई रूढियाँ और अंध-विश्वास रचता है। ये पुरोहित-पादरी-मौलवी भी हो सकते हैं और पूँजीपति-राजनेता-ब्युरोक्रेट्स भी। विवेकी राय इसीलिए भाग्यवाद की तरह वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था की विसंगतियों को भी जगह-जगह उद्घाटित करते चलते हैं। ग्रामीण जीवन की समस्याओं के लिए भी वे वर्तमान शासन-तंत्र को ही जिम्मेदार मानते हैं— “स्वराज्य, विकास, नई खेती, नए ढांचे, नई-नई साधन-सम्पन्नता, सुविधा, नए तन्त्र-यन्त्र और मनी-मन्त्र में फँस किसान निरानन्द और गाँव उदास क्यों हो गए ?....यह तुम्हरी कैसी सुराजी विकास की नई यान्त्रिक-व्यापारिक खेती है, जिसने ग्राम-देवता को मार डाला और गाँव भलमानुस-विहीन हो गया?” उन्होंने लिखा है, “हँसी सिर्फ तब आती है जब सरकार गाँव में खुशयाली आ जाने और उसके छा जाने के विविध लुभावने मुहावरों-मिथकों को उछालती है। बेशक गाँव में शांति सुव्यवस्था और सामाजिक सद्भाव की खुशियालियाँ पैर तोड़ कर बैठ गई हैं।” ‘फिर बैतलवा डाल पर’ (1962) संग्रह में ‘नई कथा’ भारतीय राजनीति के भ्रष्टाचार, दलाली, कालाबाजारी और खरीद-फरोख्त का जो चित्र प्रस्तुत करती है, वह आज की भारतीय राजनीति का आइना लगती है। साठ साल बाद भी जिस व्यवस्था में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं दिखाई देती, उसमें रहते हुए यह मान लेना कि गाँव से पलायन करके उसकी रूढियों और शोषण-चक्र से मुक्त होकर नागर जीवन जी लेना सम्भव है, निरर्थक है। भले ही इधर के कुछ विमर्शकारों को ऐसा लगता हो । शोषण की मुक्ति के लिए केवल वर्ण या जाति-व्यवस्था से मुक्ति पर्याप्त नहीं है। गाँव के भीतर ये अधिक रूढ हैं, पर नगरीय समाज भी इससे सर्वथा मुक्त नहीं। ग्रामीण जीवन में शोषण और गैर बराबरी के आधार साफ और इकहरे हैं, लेकिन नागर जीवन में इसकी अनेक परतें हैं। उद्योगीकरण और आधुनिकता की सबसे अधिक मार ग्रामीण जीवन पर पडी। नगरीकरण के फलस्वरूप गाँवों का शहरों के पेट में समा जाना, विकास के नाम पर विस्थापन और रोजगार के लिए पलायन इनकी सबसे बडी चुनौती थी। विवेकी राय इन्हें अपने लेखन की शुरुआत से ही उठाते रहे। ‘सावधान! गाँव में शहर आ रहा है’, ‘गाँव का भविष्य’, ‘गाँव और इक्कीसवीं सदी’, ‘गाँव का मूल्य’, ‘गाँव पर बनाम गाँव में’ चिन्ता भारत के उजडते गावों की’ शीर्षक उनकी ग्राम्य-संशक्ति के प्रमाण हैं। इनके अतिरिक्त अन्य निबंधों में भी वे इन प्रश्नों को उठाते रहे हैं— “लगता है गाँव सडक से उठकर सडक पर आता जा रहा है। किसान दुकानदार बनता जा रहा है। खेत में खडा है तो उसका चेहरा कुछ और तरह का है तथा सडक पर कुछ और तरह का....अच्छा है बदलाव को विकास कहें।” इसका कारण है; ‘विकास’, यानी एक बहुत बडा छद्म, जिसे वर्तमान व्यवस्था ने रचा है। विवेकी राय इस छ्द्म का प्रतिवाद करते हैं, “मैंने वैसे आत्मतुष्ट गाँवों को देखा है और जीया है, जिनके आधे-अधूरे लोग भी अपने आप में पूरे थे और गाँव-पर-गाँव का अधिकार रखते थे।” अपने निबंधों में विवेकी राय बार-बार नागर जीवन की विसंगतियों पर चोट करते हैं। अधकचरी आधुनिकता से लदी-फदी नागर संस्कृति का गाँव-गाँव में प्रवेश और ग्राम्यांचलों से पलायन उनके लेखन के केंद्र में है। वे भारत और भारतीयता ही नहीं मानव और मानवता को प्राणवान रखने के लिए गाँव को बचाए रखना जरूरी मानते हैं। उनके अनुसार “स्वयं गाँव एक ‘मूल्य’ है। घोर अवमूल्यन की स्थितियां उत्पन्न हो जाने पर भी, वह मूल्य मन के भीतर बना है। जब तक प्रकृति का सम्मोहन बना है, तब तक एक लाख अवमुल्यन की स्थितियों के घहराने के बाद भी गाँव का सांस्कृतिक मूल्य किसी न किसी रूप में सुरक्षित रहेगा मेरा ग्राम-मूल्य इसी व्यापक सांस्कृतिक केंद्र से जुड़ा है। बीसवीं शताब्दी ने उस केंद्र को बेहद निर्ममता से झकोरा है।” इस झकझोरने का परिणाम सामने है, “पुरातन परंपराओं, रीति-रहनि और वैश्विक सटाव के दो ध्रुवांतों के बीच आज का ग्राम-जीवन अटका-भटका परम अनिश्चय की स्थिति में है। यह अपने पुरानेपन के सुखद व्यामोह को विस्मृत नहीं कर पाता है। गाँव के बीच की पीढ़ी का आदमी नव परिवर्तित जीवन संदर्भों और जागतिक स्थितियों के समानांतर अपनी अस्मिता को मोड़ देने के लिए उत्सुक है। उसके कदम भी बहुत आगे बढ़ जाते हैं, किंतु नई पीढ़ी के लिए पुरानी परंपराएँ असंगत हो गई हैं उसे लगता है पुरातनता मात्र एक निष्क्रिय भावनात्मक सत्ता है। उसमें उसे नवजीवन का स्पंदन अथवा रोमांच नहीं महसूस हो रहा है। वैज्ञानिक प्रगति से जुडी कृषि क्रांति से हुए आर्थिक उत्थान के भौतिक आकर्षण दुर्निवार हैं। मगर इस उत्थान के दीप-तले अंधेरे उसे किस सीमा तक छल रहे हैं, प्रवंचित और उत्पीड़ित कर सर्वस्वापहृत कर रहे हैं, इसकी ओर से उसने आंखें मूँद लीं हैं।” नागर जीवन का आधार बौद्धिकता, हित-लाभ और स्वर्थ-संबंध माने जाते हैं तो भावुकता, रागात्मकता और सहयोग ग्रामीण जीवन का आधार कहा जाता रहा हैं । बुद्धि जिसे लाभ या स्वार्थ के मानदंड पर ठीक नहीं पाती, उसे नागर मनुष्य नकार देता है और जो उसे इन दोनों कसौटियों पर जँच जाता है, उसे स्वीकार कर लेता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान प्रकृति को उठाना पडा। नागरिक जीवन और औद्योगिक विकास ने इनका जितना अनियंत्रित दोहन पिछले सात-आठ दशकों में किया है, उतना पिछली एक सहस्राब्दी में नहीं हुआ। विवेकी राय ऐसे विकास को अनैतिक और मानव-विरोधी मानते हैं। उनका प्रकृति से अनन्य राग है। वे प्रकृति से साहचर्य को ‘जीवन का अमृत’ मानते हैं— “जीव-जगत के आश्रय भूत ‘संत सुअम्ब तरु’ के निकट रहकर दीर्घ काल तक उसका सान्निध्य सत्संग लाभ मैंने किया है। अपने अनुभव के आधार पर पर मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि वे साक्षात सत्ता हैं उनमें संवेदनशील देवत्व है और उनमें वरदान शक्ति है साथ ही अभिशाप की शक्ति भी है। यह उन्हीं का अभिशाप है कि दुनिया बाहर भीतर से बंजर होती जा रही है मेरा गांव भी बंजर हो गया है। उसने बाग भगवान का अपमान किया उन्हें बेचा काटा और प्रदुषित किया।” गाँव विवेकी राय के लिए वह धुरी है, जिसपर भारतीय संस्कृति टिकी हुई है। वे अपने निबंध में लोक-रीतियों, लोक उत्सव तथा लोक पर्वों का चित्रण बहुत सूक्ष्म और आत्मीय रूप से करते हैं। उनके गाँव विसंगतियों-विडंबनाओं के घर नहीं, लोकोत्सव का आधार हैं। जो सहजता आत्मीयता और लगाव विवेकी राय के निबंधों में गाँव के प्रति दिखाई देता है, वह हिंदी के किसी अन्य लेखक के यहाँ दुर्लभ है। ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ और ‘फिर बैतलवा डाल पर’ के निबंधों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें पढ़कर ठेठ गँवई आदमी उसे अपने जीवन और अपने गाँव में घटित होता हुआ महसूस कर सकता है। विवेकी राय ग्राम-जीवन के तटस्थ दृष्टा नहीं है, वे उसके भोक्ता और सहचर भी हैं। अपने जीवन का लगभग आधा उन्होंने इसी ग्रामीण परिवेश में बिताया है। उनके निबंधों की शैली पर भी दिखाई देती है। उन्हें पढ़ते हुए पाठक को बतकही का सा रस मिलता है। कई बार लगता है कि पाठक ठंड की रात में कउडे. पर बैठा हुआ अपने किसी स्वजन से संवाद कर रहा है। यह बात अलग है कि अपने जीवन के परवर्ती अर्द्धांश में वे यह महसूस करने लगे थे कि गाँव के जीवन और समाज के लिए उनकी तरह का आधुनिक शिक्षित बहरवाँसु और कमाऊ आदमी ‘आउटसाइडर’ हो गया है। इसलिए उसकी संरचना में वह पूरी तरह फिट नहीं हो पाता ‘अपनी पहचान खो गया है गाँव’ शीर्षक निबंध में विवेकी राय इसके कारण का उल्लेख भी करते हैं शिक्षित बुद्धिजीवी जन अथवा नागरिक मानसिकता संपन्न लोग नए सिरे से गांवों में जुड़ नहीं पाते और फलस्वरूप गाँव स्वयं ऐसे लोगों से नहीं जुड़ पाता है। उच्च शिक्षा प्राप्त लोग गाँव वालों को मूढ़ समझते हैं और इसी प्रकार गाँव वाले वैसे लोगों को पागल कहते हैं।” वे कहते हैं कि ‘क्या गाँव में पहले जैसा सहज स्नेह मिल सकेगा ?’ यह सवाल निरुत्तरित है। लेखक का यह प्रश्न उस उच्च शिक्षित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में है, जिसके भीतर प्रश्नाकुलता तो है, लेकिन उत्तर तलाशने भर का धैर्य नहीं। वह गाँव को केवल प्रश्न या उम्मीद की दृष्टि से देखता है। सहज विश्वास और अपनापन वह शहर की भीड़ ने पहले ही खो चुका है। वह स्वयं लिए ‘आउटसाइडर’ हो चुका है। वह अकेला, बल्कि आत्म-निर्वासित है । ऐसे व्यक्ति के लिए गाँव में कोई जगह नहीं है क्योंकि ग्राम्य जीवन में समूह का अस्तित्व है, व्यक्ति का नहीं। यदि हम अपने नगर प्रवास से अर्जित ‘स्व’ पर अड़े न रहकर उसे गाँव की सामूहिकता में विलीन कर दें तो यह प्रश्न स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। विवेकी राय के का साहित्य इस ‘स्व’ के विलयन का ही प्रतिफल है। एक कस्बे में रहते हुए भी वे कभी कस्बाई जीवन के अभ्यस्त नहीं बने। उन्होंने कभी अपने भीतर के गाँव को निर्वासित नहीं होने दिया। हमारी लालच की जिह्वा की लपलपाती आरी सर्वव्यापी हो गई है। उसकी पहुँच क्या गाँव, क्या शहर और क्या दुश्प्रवेश्य जंगल —हर जगह है और हर जगह बराबर गति से चल रही है। ऐसे में विवेकी राय की चिंताएँ हमारे समय की सर्वभौमिक चिंताएँ है। ये हमारी पीढी के सामने यक्ष-प्रश्न बन गई हैं और इनसे जूझने के हमें अलावा कोई विकल्प दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। उपभोक्तावाद और बाजारवाद के विस्तार के साथ इनकी गति निरंतर बढ रही है। क्या होगा— उपभोग और विकास की गति पर रोक या विनाश के गर्त की तरफ लगातार बढते जाना? यह तो भविष्य के गर्भ में है, पर विवेकी राय के निबंधों को पढते हुए पाठक को यह बारबार लगता है कि वे हमें इनसे बचाने के लिए गाँव की उन सघन अमराइयों की छाया में ले जाना चाहतें हैं, जो अब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। वे उन्हें बचाने और बढाने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। हमारे भीतर का गँवईपन जगाना और सहयोग, साहचर्य तथा सहज-राग के रस को के प्रवाह को अक्षुण्ण बनाना चहते हैं। आजादी के बाद के राजनीतिक मुहावरे के रूप में प्रचलित ‘सुराज’ की आलोचना और उसपर कटाक्ष करते हुए भी वे भविष्य के भारत में महात्मा गाँधी के ग्राम-स्वराज का स्वप्न साकार होते हुए देखना चाहते हैं। उनकी आस्था गांधी जी के स्वराज और सुराज में है । उनहोंने एक ऐसे ‘राम-राज’ का स्वप्न देखा है, जो ‘सोने की लंका के ध्वंश’ और ‘भूख के रावण’, ‘गरीबी के मेघनाद’ तथा ‘मूर्खता के कुंभकरण’ के अंत के बाद स्थापित होगा।
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