साहित्य-संवाद
साहित्य समय और संस्कृति
बुधवार, 1 अगस्त 2012
छोटी मछली
अच्छा
लगता
था
थूकना
बचपन
में
तालाब
के
पानी
में
मछलियों
का
लपकना
निगल
जाना
उसे
उछल
कर
झटके
से
.
नहीं
जनता
था
तब
कितना
मुश्किल
है
निगल
जाना
किसी
और
की
थूक
झपटकर
बड़ी
मछली
के
डर
से
छोटी
मछली
का
.
सरहदें
परिंदा कोई तुम्हारे
आँगन
का
नहीं
मार सकता पर
मेरे
आँगन
में
,
मूंद
दीं बिलें चीटीयों
की
कायम
करती
थी
जो
बेवजह
आवाजाही
तुम्हारे
घर
से
मेरे
घर की
,
रोशनदानों
पर
जड़
दिए मोटे
शीशे
न
आ
सके
नापाक हवा
तुम्हारे दरख्तों
की
मुझ
तक
मेरे
घर
मेरी
आद
-
औलादों
तक
,
फिर, कैसे
रोया
मेरा
नवजात
बच्चा
तुम्हारे
बच्चे
की
आवाज
में
?
अरे
!
अब
हँस
रहा
तुम्हारा
बच्चा
मेरे
बच्चे
की
तरह
.
क्या
महफूज़
हैं
,
सच
-
मुच
हमारी
-
तुम्हारी
सरहदें
!
नई पोस्ट
पुराने पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
लोकप्रिय पोस्ट
उठ जाग मुसाफ़िर : विवेकी राय
विवेकी राय हिन्दी ललित निबन्ध परम्परा के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं. इस विधा में उनकी गिनती आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदि, विद्यानिव...
War and War : इतिहास, युद्ध और मानव सभ्यता की त्रासदी का दार्शनिक आख्यान
विश्व साहित्य में कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनते, बल्कि पाठक के सामने जीवन, इतिहास, सभ्यता और मानव अस्तित्व ...
हम भारत के नए प्रणेता
हम भारत के नए प्रणेता नई क्रांति हम लाएंगे l घर-घर शिक्षा दीप जलाकर अपना फर्ज निभाएंगे नहीं रहेगा एक निरक्षर विश्व गुरु कहलाएंगे ll हम भ...
कुबेरनाथ राय : परिचय
कुबेरनाथ राय से उनके जीवन के बारे में पूछने पर एक बार उन्होंने कहा था- ‘‘मेरे जीवन में कुछ भी ऐसा उग्र, उत्तेजक, रोमांटिक, अद्भुत या विशिष...
प्रकृति: भारतीय दृष्टि
भारतीय परंपरा सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का निवास मानती है । समूची सृष्टि में ईश्वर के निवास का अर्थ है इस समूची सृष्टि के प्रति ईश्वर के स...
रामकथा और कुबेरनाथ राय
कुबेरनाथ राय के लेखन का तीसरा विषय-क्षेत्र है µ रामकथा इसमें वे खूब रमे हैं। उन्होंने इस विषय पर तीन स्वतन्त्र किताबें ही लिख डाली हैं। ‘...
विवेकी राय के निबंधों भारत-बोध
विवेकी राय का भारत ग्रामीण भारत है और उनकी भारतीयता का वास इसी ग्राम्य जीवन के भीतर है। गाँव भारतीय समाज संस्कृति और अर्थव्यवस्था तीनों की...
का जौ बहुतै हिन्दी भाखेउ
हिंदी दिवस पर हिंदी के संवैधानिक अधिकार, अन्य भारतीय भाषाओं के बीच स्वीकृति-अस्वीकृति के साथ अंग्रेजी के पैरोकारों की चर्चा खूब होती है। ये ...
भाई गिरगिट
भाई गिरगिट ! मैंने सुना है तुम रंग बदलते हो परिस्थितियों के अनुकूल. पर पता है आजकल परिस्थितियाँ बदली जारही हैं रंगों के अनुकूल. तुम ...
वासुदेव शरण अग्रवाल : चयन और मूल्यांकन की दो दृष्टियाँ
वासुदेव शरण अग्रवाल मेरे प्रिय लेखकों में एक हैं। भारतीय संस्कृति की मेरी थोड़ी बहुत समझ जिन लेखकों को पढ़कर बनी है, वे उनमें से...