रविवार, 9 जनवरी 2011

कबूतर

मैं नभचारी
मैं उन्मुक्त
पर दरख्तों की टहनियों पर नहीं बसता
नहीं बनाता आशियाने अपने लिए
मुझे तलाश रहती है
रोशनदनों, झरोखों और मुरेडों की नक्काशीदार
अब भी.
अब भी लगाता हूं चक्कर
बीरान खण्डहरों की
जहां बची है थोडी सी जगह
मेरे लिये
थोडी सी आस
गुजारने कि रात
सहने कि शीत-घाम-वर्षा.
जो अनुपयोगी हैं
तुम्हारे लिए अब.

आखिर
समय कि पीठ पर पैर रख कर गुजरना ही तो सीखा है
अब तक तुमने
और मैंने
मुड-मुड के देखना
आवाज देना वक्त को __ गुटुरगूं-गुटुरगूं.
तभी तो तुम ठहरे मनुष्य
और मैं कबूतर.

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