बुधवार, 24 जून 2026
जीस्त के इस ढाल पर
थक गया हूँ वक़्त! कदमों की नहीं आहट कहीं,
उम्र गुज़री राह में, मंज़िल की अब चाहत नहीं।
जीस्त के इस ढाल पर अब आशियाना क्या करूँ,
हो मयस्सर छाँव भी, फिर भी कहीं राहत नहीं।
आँख में जिस ख़्वाब को मैंने सँजोया रात भर,
सुबह देखा तो हक़ीक़त में कोई सूरत नहीं।
धूप, आँधी, गर्दिशों का सिलसिला देखा बहुत,
अब किसी तूफ़ान से दिल को कोई दहशत नहीं।
अब तलक जिनकी हिफ़ाज़त में गुज़ारी ज़िन्दगी,
अब हमारे वास्ते उनकी कोई क़ीमत नहीं।
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