यात्रा जीवन का एक आनंददायक अनुभव है। वह जीवन का हो, सृजन का हो या खांटी घुमक्कड़ी का। यात्रा तो यात्रा ही है। वह भी जब यात्री नीरा यायावर और गप्पी हो तो उसका कहना ही क्या ? फिर तो यात्रा कर्म भी है और लक्ष्य भी। गीता में कृष्ण ने जिस कर्म योग की बात की है: कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेसु कदाचन। उसका असल अधिकारी वही है।...
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
लोकप्रिय पोस्ट
-
विवेकी राय हिन्दी ललित निबन्ध परम्परा के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं. इस विधा में उनकी गिनती आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदि, विद्यानिव...
-
कुबेरनाथ राय खांटी भारतीय चिंतक रहे हैं। उनके लेखन और मानसिक संस्कार दोनों में भारतीयता कूट-कूट कर भरी हुई है। लेकिन वे आधुनिक विश्व-चिंतन...
-
गांव की ईट की इन भट्ठियों में रहकर उनकी तपन सहकर और फिर भी इन घरों के प्रति अथाह राग रखकर हम डार्विन के श्रेष्ठतम की उत्तर जीविता को निरंतर ...
-
बैशाख फिर आ गया। यह जब भी आता है तो मेरे लिए अपनी झोली में उल्लास भर लाता है। बैशाख और उल्लास ! अजीब बात है न। दुनिया जहाँ को तो सारा राग-र...
-
आचार्य वासुदेवशरण अग्रवाल विभिन्न ज्ञानानुशासनों के सम्पुंजित विग्रह हैं। भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य, कला, इतिहास तथा भू-तत्व और लोक-विद्या...
-
शब्द ! मुझे शब्द चाहिए- हथौड़े का नहीं चोट खाए लोहे का शब्द. मधुमयी रात में रति-गृह के प्रेमालाप नहीं, निशीथ के निःशब्द एकांत को ...
-
कुबेरनाथ राय से उनके जीवन के बारे में पूछने पर एक बार उन्होंने कहा था- ‘‘मेरे जीवन में कुछ भी ऐसा उग्र, उत्तेजक, रोमांटिक, अद्भुत या विशिष...
-
हिंदी दिवस पर हिंदी के संवैधानिक अधिकार, अन्य भारतीय भाषाओं के बीच स्वीकृति-अस्वीकृति के साथ अंग्रेजी के पैरोकारों की चर्चा खूब होती है। ये ...
-
हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य में कुबेरनाथ राय की पहचान एक ऐसे ललित निबन्धकार की है जिसकी चेतना का विकास परम्परा और आधुनिकता के समवाय स...
-
सनातन नदी : अनाम धीवर कुबेरनाथ राय भगवान् बुद्ध जब तरुण थे, जब उनकी तरुण प्रज्ञा काम, क्रोध, मोह के प्रति निरन्तर खड्गहस्त थी, त...